ज़िल्लर वार्ता राष्ट्रीय,श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के कैबिनेट विस्तार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस (National Conference) के भीतर असंतोष को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए चेहरों और मंत्री पद से वंचित रह गए नेताओं को लेकर पार्टी के अंदर नाराजगी की खबरें सामने आई हैं। इस घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।
27 अक्टूबर 2026 को श्रीनगर स्थित लोक भवन में चार नए मंत्रियों ने शपथ ली। इस कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को लेकर सवाल उठने लगे। हालांकि, विरोध प्रदर्शन की प्रकृति और उसमें शामिल लोगों की संख्या की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार ने अक्टूबर 2024 में सत्ता संभाली थी। इसके बाद 27 अक्टूबर 2026 को मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया। इस फेरबदल में अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ कल्लू को मंत्री बनाया गया, जबकि स्वतंत्र विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर किया गया।
मंत्रिमंडल में जगह पाने की उम्मीद लगाए बैठे कई नेताओं के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण रहा। जम्मू-कश्मीर में मंत्रिपरिषद का अधिकतम आकार मुख्यमंत्री सहित नौ सदस्यों का हो सकता है। सीमित पदों के कारण पार्टी के भीतर वरिष्ठता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राजनीतिक अनुभव के आधार पर नियुक्तियों को लेकर चर्चा होती रही है।
कैबिनेट विस्तार के बाद राजनीतिक हलकों में इस बात पर चर्चा हो रही है कि मंत्री पद नहीं मिलने से कुछ नेताओं में असंतोष पैदा हो सकता है। किसी भी राजनीतिक दल में मंत्रिमंडल गठन के दौरान कई दावेदार होते हैं, लेकिन सभी को जिम्मेदारी देना संभव नहीं होता। नेशनल कॉन्फ्रेंस के सामने भी वरिष्ठ नेताओं को प्रतिनिधित्व देने और सरकार के कामकाज के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।
हालांकि, पार्टी के भीतर असंतोष की खबरों और सड़क पर हुए किसी संगठित प्रदर्शन के बीच अंतर करना जरूरी है। जम्मू-कश्मीर की मंत्री सकीना इटू ने 27 अक्टूबर को पार्टी में विरोध प्रदर्शन की खबरों को खारिज करते हुए कहा कि नेताओं को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी राय रखने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि अपनी नाराजगी या विचार व्यक्त करने को प्रदर्शन नहीं माना जाना चाहिए।
कैबिनेट विस्तार के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के सामने सरकार के कामकाज के साथ-साथ पार्टी के भीतर विभिन्न नेताओं की अपेक्षाओं को संभालने की चुनौती भी है। मंत्रिमंडल में किसे जगह मिलेगी और किसे संगठन में जिम्मेदारी दी जाएगी, इसे लेकर राजनीतिक दलों में अक्सर चर्चा होती है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि पार्टी को सरकार चलाने के साथ अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाए रखना है। वरिष्ठ नेताओं, नए चेहरों और अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाना मंत्रिमंडल के गठन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सहयोगी कांग्रेस ने राज्य का दर्जा बहाल होने तक सरकार में मंत्री पद स्वीकार नहीं करने का रुख अपनाया है। ऐसे में कैबिनेट विस्तार के दौरान कांग्रेस कोटे से किसी मंत्री के शामिल होने का सवाल भी नहीं उठा। इस फैसले के कारण सरकार की संरचना और गठबंधन की रणनीति चर्चा का विषय बनी हुई है।
कैबिनेट विस्तार के बाद उठ रहे सवालों से यह स्पष्ट है कि मंत्री पदों का बंटवारा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। हालांकि, पार्टी में असंतोष की खबरों को किसी बड़े विद्रोह या सरकार के लिए संकट का संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी।
देखें वीडियो: श्रीनगर में कैबिनेट विस्तार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं के कथित विरोध प्रदर्शन से जुड़ा वीडियो इस खबर के साथ जोड़ा जा सकता है। इस विशेष प्रदर्शन का सत्यापित वीडियो लिंक उपलब्ध नहीं होने के कारण यहां वीडियो एम्बेड नहीं किया गया है।
फिलहाल, कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों और नेतृत्व की प्रतिक्रियाओं पर सबकी नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व असंतुष्ट नेताओं को किस तरह साथ लेकर चलता है और सरकार के भीतर राजनीतिक संतुलन कैसे बनाए रखता है।